उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shikasta-par junun ko aazmaenge nahin kya

शिकस्ता-पर जुनूँ को आज़माएँगे नहीं क्या

شکستہ پر جنوں کو آزمائیں گے نہیں کیا

शायर: Iftikhar Arif6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शिकस्ता-पर जुनूँ को आज़माएँगे नहीं क्या
उड़ानों के लिए पर फड़फड़ाएँगे नहीं क्या

हवाएँ मेहरबाँ थीं मुंतक़िम क्यूँ हो गई हैं
निगह-वरान-ए-साहिल कुछ बताएँगे नहीं क्या

कोई हँसता हुआ सूरज पस-ए-दीवार-ए-तारीक
फ़िरोज़ाँ हो तो दीवारें गिराएँगे नहीं क्या

वही पहली सी अर्ज़ानी सर-ए-बाज़ार-ए-पिंदार
नज़र आए तो हम क़ीमत बढ़ाएँगे नहीं क्या

सवाद-ए-तिश्नगी के पार इक मव्वाज दरिया
ग़ज़ल-ख़्वाँ हो तो फिर तेशे उठाएँगे नहीं क्या

बदलते मौसमों की धूल होते रास्तों को
थके-हारे मुसाफ़िर याद आएँगे नहीं क्या