उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shikasta-haal sa be-asra sa lagta hai

शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है

شکستہ حال سا بے آسرا سا لگتا ہے

शायर: Obaidullah Aleem12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है
ये शहर दिल से ज़ियादा दुखा सा लगता है

हर इक के साथ कोई वाक़ि'आ सा लगता है
जिसे भी देखो वो खोया हुआ सा लगता है

ज़मीन है सो वो अपनी गर्दिशों में कहीं
जो चाँद है सो वो टूटा हुआ सा लगता है

मिरे वतन पे उतरते हुए अँधेरों को
जो तुम कहो मुझे क़हर-ए-ख़ुदा सा लगता है

जो शाम आई तो फिर शाम का लगा दरबार
जो दिन हुआ तो वो दिन कर्बला सा लगता है

ये रात खा गई इक एक कर के सारे चराग़
जो रह गया है वो बुझता हुआ सा लगता है

दु'आ करो कि मैं उस के लिए दु'आ हो जाऊँ
वो एक शख़्स जो दिल को दु'आ सा लगता है

तो दिल में बुझने सी लगती है काएनात तमाम
कभी कभी जो मुझे तू बुझा सा लगता है

जो आ रही है सदा ग़ौर से सुनो उस को
कि इस सदा में ख़ुदा बोलता सा लगता है

अभी ख़रीद लें दुनिया कहाँ की महँगी है
मगर ज़मीर का सौदा बुरा सा लगता है

ये मौत है या कोई आख़िरी विसाल के बा'द
'अजब सुकून में सोया हुआ सा लगता है

हवा-ए-रंग-ए-दो-आलम में जागती हुई लय
'अलीम' ही कहीं नग़्मा-सरा सा लगता है