उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab to firaq-e-subh mein bujhne lagi hayat

अब तो फ़िराक़-ए-सुब्ह में बुझने लगी हयात

اب تو فراق صبح میں بجھنے لگی حیات

शायर: Obaidullah Aleem4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब तो फ़िराक़-ए-सुब्ह में बुझने लगी हयात
बार-ए-इलाह कितने पहर रह गई है रात

हर तीरगी में तू ने उतारी है रौशनी
अब ख़ुद उतर के आ कि सियह-तर है काएनात

कुछ आईने से रक्खे हुए हैं सर-ए-वजूद
और इन में अपना जश्न मनाती है मेरी ज़ात

बोले नहीं वो हर्फ़ जो ईमान में न थे
लिक्खी नहीं वो बात जो अपनी नहीं थी बात