उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajib thi wo ajab tarah chahta tha main

अजीब थी वो अजब तरह चाहता था मैं

عجیب تھی وہ عجب طرح چاہتا تھا میں

शायर: Obaidullah Aleem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजीब थी वो अजब तरह चाहता था मैं
वो बात करती थी और ख़्वाब देखता था मैं

विसाल का हो कि उस के फ़िराक़ का मौसम
वो लज़्ज़तें थीं कि अंदर से टूटता था मैं

चढ़ा हुआ था वो नश्शा कि कम न होता था
हज़ार बार उभरता था डूबता था मैं

बदन का खेल थीं उस की मोहब्बतें लेकिन
जो भेद जिस्म के थे जाँ से खोलता था मैं

फिर इस तरह कभी सोया न इस तरह जागा
कि रूह नींद में थी और जागता था मैं

कहाँ शिकस्त हुई और कहाँ सिला पाया
किसी का इश्क़ किसी से निबाहता था मैं

मैं अहल-ए-ज़र के मुक़ाबिल में था फ़क़त शाएर
मगर मैं जीत गया लफ़्ज़ हारता था मैं