उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shikan jabin pe na lae nazar jhuka ke chale

शिकन जबीं पे न लाए नज़र झुका के चले

شکن جبیں پہ نہ لائے نظر جھکا کے چلے

शायर: Ehsan Darbhangavi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शिकन जबीं पे न लाए नज़र झुका के चले
ख़ुदी की लाश उठानी ही थी उठा के चले

ये मय-कदा है यहाँ लग़्ज़िशों से रौनक़ है
कोई बहक के चले कोई लड़खड़ा के चले

ठहर गए तो ज़माने को साथ ठहराया
चले तो होश उड़ाते हुए हवा के चले

ग़म-ए-हयात को समझे थे अहल-ए-दिल भारी
हमें है नाज़ कि ये बोझ भी उठा के चले

वो बादा-ख़्वार नहीं और कुछ है ऐ साक़ी
शराब पी के जो मानिंद पारसा के चले

रह-ए-जुनूँ में हज़ारों थे हम-सफ़र लेकिन
चराग़ ले के हम ही सामने हवा के चले

वो जाम-ए-मय हो कि हो जाम-ए-अंगबीं 'एहसाँ'
चले जो दौर भी वो ज़र्फ़ आज़मा के चले