उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shaiKH aaKHir ye surahi hai koi KHum to nahin

शैख़ आख़िर ये सुराही है कोई ख़ुम तो नहीं

شیخ آخر یہ صراحی ہے کوئی خم تو نہیں

शायर: Qamar Jalalvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शैख़ आख़िर ये सुराही है कोई ख़ुम तो नहीं
और भी बैठे हैं महफ़िल में हमीं तुम तो नहीं

ना-ख़ुदा होश में आ होश तिरे गुम तो नहीं
ये तो साहिल के हैं आसार-ए-तलातुम तो नहीं

नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा होंटों पे हल्की सी हँसी
तेरी तस्वीर में सब कुछ है तकल्लुम तो नहीं

देख अंजाम मोहब्बत का बुरा होता है
मुझ से दुनिया यही कहती है बस इक तुम तो नहीं

मुस्कुराते हैं सलीक़े से चमन में ग़ुंचे
तुम से सीखा हुआ अंदाज़-ए-तबस्सुम तो नहीं

अब ये मंसूर को दी जाती है नाहक़ सूली
हक़ की पूछो तो वो अंदाज़-ए-तकल्लुम तो नहीं

चाँदनी-रात का क्या लुत्फ़ 'क़मर' को आए
लाख तारों की बहारें हैं मगर तुम तो नहीं