उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham Dhale jab papa ghar mein aate the

शाम ढले जब पापा घर में आते थे

شام ڈھلے جب پاپا گھر میں آتے تھے

शायर: Deepak Ghazipuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम ढले जब पापा घर में आते थे
डर के मारे हम पढ़ने लग जाते थे

हम दो भाई ऐसे प्यार जताते थे
इक रोटी में आधा आधा खाते थे

याद हमें हैं हम बचपन में अम्माँ के
चप्पल जूते डंडे सब सह जाते थे

बचपन में नानी दादी के क़िस्सों में
परियों की नगरी में घूम के आते थे

अंतर-देसी एक लिफ़ाफ़ा होता था
जिस में हम दिल के अरमाँ लिख जाते थे

उस भाई से आज मुक़दमा लड़ते हैं
जिस की ख़ातिर दुनिया से लड़ जाते थे