उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sehn-e-chaman mein phulon ke ruKHsar nam hue

सेहन-ए-चमन में फूलों के रुख़्सार नम हुए

صحن چمن میں پھولوں کے رخسار نم ہوئے

शायर: Bahar Barni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सेहन-ए-चमन में फूलों के रुख़्सार नम हुए
कुछ हादसे ज़रूर कहीं सुब्ह-दम हुए

रख ली शिकस्ता-पाई ने जोश-ए-जुनूँ की लाज
फूटा जब आबला कोई हम ताज़ा दम हुए

सूरज-मुखी की छाओं में बैठे हैं अब के लोग
हर आफ़्ताब-ए-नौ को जो देखा तो ख़म हुए

हर दौर की हम अहल-ए-जुनूँ दास्ताँ बने
हर रंग में हमारे फ़साने रक़म हुए

आया हमें न रास तिरा पत्थरों का शहर
मुद्दत गुज़र गई सर-ए-तस्लीम ख़म हुए

महसूस हो रहा है कि सदियाँ गुज़र गईं
उफ़ तेरे इंतिज़ार के लम्हे न कम हुए

टूटे दिलों के आइना-ख़ाने ही ऐ 'बहार'
शीशा कभी बने तो कभी जाम-ए-जम हुए