उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ruKHsaron pe gul mahke aankhon mein haya aai

रुख़्सारों पे गुल महके आँखों में हया आई

رخساروں پہ گل مہکے آنکھوں میں حیا آئی

शायर: Bahar Barni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रुख़्सारों पे गुल महके आँखों में हया आई
ये किस ने तुम्हें देखा ये किस की क़ज़ा आई

ज़ुल्फ़ों की महक ले कर फिर मौज-ए-सबा आई
फिर याद हमें उन की एक एक अदा आई

ऐ बाद-ए-सहर-गाही क्या सोच के आख़िर तू
रंगीनी-ए-शब उन की आँखों में जगा आई

जैसे ग़म-ए-सहरा के तन्हा हमीं रहरौ हैं
हर मोड़ पे कानों में अपनी ही सदा आई

जो कुछ भी गुज़रती थी गुज़री शब-ए-ग़म दिल पर
शबनम को ये क्या सूझी फूलों को रुला आई

वो किस का नशेमन था ऐ बर्क़-ए-तपाँ जिस के
जलते हुए तिनकों से भी बू-ए-वफ़ा आई

कल सुब्ह बहार-ए-गुल थी रक़्स-कुनाँ हर-सू
गुलशन को तिरी ख़ुशबू दीवाना बना आई