उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saza mili hai bikharne ki aur simaTne ki

सज़ा मिली है बिखरने की और सिमटने की

سزا ملی ہے بکھرنے کی اور سمٹنے کی

शायर: Zafar Ghauri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सज़ा मिली है बिखरने की और सिमटने की
ख़ता हुई थी हवाओं से कल लिपटने की

किताब-ए-दिल की जबीं पर रक़म थी वो तहरीर
किसी में ताब न थी फिर वरक़ उलटने की

सबा ने बात उड़ा ली महकते रंगों से
किसी दरख़्त से इक बेल के लिपटने की

दिलों में टूट गए राब्तों के सब टाँके
ख़बर है रेल के नीचे किसी के कटने की

न पार हो सकी लम्हों की तेज़ रौ नद्दी
लगी है चोट कहीं काई पर रपटने की

तलाश करता हूँ अंजाम ख़्वाब-रेज़ी का
ये ज़िंदगी है सज़ा कच्ची नींद उचटने की

बने हैं कितने ही पत्थर के इस ख़राबे में
ख़ता तिलिस्म-ए-सफ़र से थी रुख़ पलटने की