उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sawad-e-shahr-e-madina ke ru-baru hona

सवाद-ए-शहर-ए-मदीना के रू-ब-रू होना

سواد شہر مدینہ کے روبرو ہونا

शायर: Parveen Shakir7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सवाद-ए-शहर-ए-मदीना के रू-ब-रू होना
ज़रूरी हो गया आँखों का बा-वज़ू होना

कहाँ नसीब में तकमील-ए-आरज़ू होना
दयार-ए-सब्ज़ में इस दिल का सुर्ख़-रू होना

समा'अतों के लिए सा'अत-ए-शगुफ़्त-ए-गुलाब
हवा-ए-शहर-ए-नबुव्वत से गुफ़्तुगू होना

'अजब तरह किसी सहरा-नशीं की याद आई
कि चश्म-ए-ख़ुश्क मिरी चाहे आब-जू होना

खुला है नाम पे कैसे तबीब के लेकिन
ये ज़ख़्म वो है कि माँगे नहीं रफ़ू होना

मिरी जड़ें इसी मिट्टी में हों मगर चाहूँ
ख़याल-ए-तैबा से ही रूह की नुमू होना

गुनाहगार हूँ मैं और चश्म-पोश है तू
बहुत है तेरी नज़र का कभू कभू होना