उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sang ki zad pe sahi aaina-KHane mere

संग की ज़द पे सही आइना-ख़ाने मेरे

سنگ کی زد پہ سہی آئنہ خانے میرے

शायर: Laeeq Akbar Sahaab8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

संग की ज़द पे सही आइना-ख़ाने मेरे
हरगिज़ आसान नहीं 'अक्स मिटाने मेरे

मुझ से मिलते ही नहीं यार पुराने मेरे
क्या उन्हें भूल गए सारे ठिकाने मेरे

वस्ल की शब जो खुलीं बंद-ए-क़बा की गिरहें
होश सब छीन लिए होश-रुबा ने मेरे

जिस्म की ख़ाक में मदफ़न था ख़ज़ीना दिल का
कोई आया ही नहीं दिल को चुराने मेरे

छोड़ बैठे हो तो अब छोड़ दो पीछा मेरा
याद क्यों आते हो अब दिल को दुखाने मेरे

हाँ कभी फूल या ख़ुशबू भरे ख़त होते थे
अब तो रहती हैं किताबें ही सिरहाने मेरे

जाने किस सेहर से सोया है मुक़द्दर या-रब
भेज क़िस्मत की परी बख़्त जगाने मेरे

उस ने छोड़ा न कभी तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल को 'सहाब'
जिस से मंसूब हुए सारे फ़साने मेरे