उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samundaron ke udhar se koi sada aai

समुंदरों के उधर से कोई सदा आई

سمندروں کے ادھر سے کوئی صدا آئی

शायर: Parveen Shakir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समुंदरों के उधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खुले हवा आई

सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खुले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई

उतर रही हैं अजब ख़ुशबुएँ रग-ओ-पै में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई

उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई

कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई