उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samundaron ke safar par hain rahnuma bhi nahin

समुंदरों के सफ़र पर हैं रहनुमा भी नहीं

سمندروں کے سفر پر ہیں رہنما بھی نہیں

शायर: Qamar Abbas Qamar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समुंदरों के सफ़र पर हैं रहनुमा भी नहीं
हम ऐसे लोगों की कश्ती का नाख़ुदा भी नहीं

यक़ीन-ए-दिल के लिए आलम-ए-गुमानी में
उसे पुकार रहा हूँ तो सुन रहा भी नहीं

ये किस उमीद पे आँखों में रक़्स बाक़ी है
तू जा चुका तिरे आने का आसरा भी नहीं

अलग अलग सी है सम्तों का अब सफ़र दरपेश
तुम्हारा हाथ मिरे हाथ से जुदा भी नहीं

हमीं से रौनक़-ए-बाज़ार-ए-इश्क़ क़ाएम थी
हमारे बा'द तो शहरों में कुछ बचा भी नहीं

फ़ज़ा में हब्स है जंगल उदास लगता है
‘अजीब दुख है परिंदों का चहचहा भी नहीं

ज़बाँ की दाद मगर तेरे लब तलक आऊँ
मैं एक लफ़्ज़ में सिमटी हुई दु'आ भी नहीं

तुम एक 'उम्र की कोशिश में राएगाँ गुज़रे
हरीम-ए-दिल में चराग़-ए-वफ़ा जला भी नहीं

मैं अपने क़त्ल का इल्ज़ाम किस के सर रक्खूँ
यहाँ तो मेरे सिवा कोई दूसरा भी नहीं