उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samajh baiTha wo aaKHir na-samajh mujhko

समझ बैठा वो आख़िर ना-समझ मुझ को

سمجھ بیٹھا وہ آخر نا سمجھ مجھ کو

शायर: Zaan Farzaan9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समझ बैठा वो आख़िर ना-समझ मुझ को
मैं जिस को ख़ूब कहता था समझ मुझ को

बड़ा आसान था शायद समझना पर
बड़ी ही देर में आया समझ मुझ को

बढ़ा कर प्यास वो मेरी लगा कहने
मैं दरिया हूँ मगर सहरा समझ मुझ को

जिसे आँखें कभी समझा नहीं पाईं
भला उस से मैं क्यों कहता समझ मुझ को

न ख़ुद से फ़र्ज़ कर कुछ भी मिरे बारे
मैं जैसा हूँ कभी वैसा समझ मुझ को

मैं तुझ से भीक क्यों माँगूँ मोहब्बत की
न इतना भी गया-गुज़रा समझ मुझ को

अगर रिश्ते में हो जाए फ़ज़ीहत 'आम
तो उस रिश्ते से वारस्ता समझ मुझ को

ब-जुज़ रब के यहाँ है 'आरज़ी हर साथ
कम-अज़-कम आ गया इतना समझ मुझ को

ये दिल का टूटना भी लाज़मी था 'ज़ान'
कभी आती नहीं वर्ना समझ मुझ को