उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saKHt na-hamwar o mushkil tha magar aisa na tha

सख़्त ना-हमवार ओ मुश्किल था मगर ऐसा न था

سخت نا ہموار و مشکل تھا مگر ایسا نہ تھا

शायर: Balraj Hairat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सख़्त ना-हमवार ओ मुश्किल था मगर ऐसा न था
मैं ने जब राहें तराशी थीं सफ़र ऐसा न था

किस ज़माने का हवाला दे रहे हो दोस्तो
आज से पहले तो जीने का हुनर ऐसा न था

शामिल-ए-हालात अगर होतीं न कुछ ख़ुश-फ़हमियाँ
मेरी क़िस्मत में भटकना दर-ब-दर ऐसा न था

मुझ से क्यों मंसूब हो बैठीं वफ़ा की ने'मतें
मैं तो अपने वास्ते भी मो'तबर ऐसा न था

मैं कहाँ ऐसा कि झुटलाऊँ तुम्हें लेकिन ये है
मैं ने जब देखा जहाँ देखा बशर ऐसा न था

आज तक बैनस्सुतूर उलझी हुई तहरीर हूँ
मैं कि पत्थर था मगर पत्थर-नज़र ऐसा न था

मैं ने किस बूते पे दी 'हैरत' सदा तूफ़ान को
मेरे ख़्वाबों का शबिस्ताँ मेरा घर ऐसा न था