उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sajde tere kahne se main kar lun bhi to kya ho

सज्दे तिरे कहने से मैं कर लूँ भी तो क्या हो

سجدے ترے کہنے سے میں کر لوں بھی تو کیا ہو

शायर: Qamar Jalalvi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सज्दे तिरे कहने से मैं कर लूँ भी तो क्या हो
तू ऐ बुत-ए-काफ़िर न ख़ुदा है न ख़ुदा हो

ग़ुंचे के चटकने पे न गुलशन में ख़फ़ा हो
मुमकिन है किसी टूटे हुए दिल की सदा हो

खा उस की क़सम जो न तुझे देख चुका हो
तेरे तो फ़रिश्तों से भी वा'दा न वफ़ा हो

इंसाँ किसी फ़ितरत पे तो क़ाएम हो कम-अज़-कम
अच्छा हो तो अच्छा हो बुरा हो तो बुरा हो

इस हश्र में कुछ दाद न फ़रियाद किसी की
जो हश्र कि ज़ालिम तिरे कूचे से उठा हो

इतरा के ये रफ़्तार-ए-जवानी नहीं अच्छी
चाल ऐसी चला करते हैं जैसी कि हवा हो

मय-ख़ाने में जब हम से फ़क़ीरों को न पूछा
ये कहते हुए चल दिए साक़ी का भला हो

अल्लाह-रे ओ दुश्मन-ए-इज़हार-ए-मोहब्बत
वो दर्द दिया है जो किसी से न दवा हो

तन्हा वो मिरी क़ब्र पे हैं चाक-गरेबाँ
जैसे किसी सहरा में कोई फूल खिला हो

मंसूर से कहती है यही दार-ए-मोहब्बत
उस की ये सज़ा है जो गुनहगार-ए-वफ़ा हो

जब लुत्फ़ हो अल्लाह सितम वालों से पूछे
तू यास की नज़रों से मुझे देख रहा हो

फ़रमाते हैं वो सुन के शब-ए-ग़म की शिकायत
किस ने ये कहा था कि 'क़मर' तुम हमें चाहो