उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sajda-e-pir-e-mughan hasil-e-irfan nikla

सज्दा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हासिल-ए-इरफ़ाँ निकला

سجدہ پیر مغاں حاصل عرفاں نکلا

शायर: Vahshi Kanpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सज्दा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हासिल-ए-इरफ़ाँ निकला
जिस को हम कुफ़्र समझते थे वो ईमाँ निकला

ता कुजा ख़ाक की परवाज़ का इम्काँ निकला
फ़र्श क्या अर्श भी जौलाँ-गह-ए-इंसाँ निकला

शोर सुनते थे बहुत नाला-ए-दिल का अपने
ये भी आख़िर को हरीफ़-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ निकला

इश्क़ तो इश्क़ है ख़ुद हुस्न भी इस गुलशन में
चाक-ए-दिल चाक-ए-जिगर चाक-ए-गरेबाँ निकला

क़ैद-ए-ग़म क़ैद-ए-वफ़ा क़ैद-ए-नज़र क़ैद-ए-जुनूँ
गोशा गोशा चमन-ए-इश्क़ का दंदाँ निकला

न हुई रूह मुकद्दर कभी आलाइश से
शो'ला हर दम ख़स-ओ-ख़ाशाक से उर्यां निकला

ख़ार-ए-सहरा की तमन्ना थी कि उलझें लेकिन
पैरहन में न जुनूँ के कोई दामाँ निकला