उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sahra-e-zindagi ke liye nur-e-dida hun

सहरा-ए-ज़िंदगी के लिए नूर-ए-दीदा हूँ

صحرائے زندگی کے لئے نور دیدہ ہوں

शायर: Parkash Nath Parvez8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सहरा-ए-ज़िंदगी के लिए नूर-ए-दीदा हूँ
काँटा सही मगर मैं गुल‌‌‌‌-ए-नौ-दमीदा हूँ

मुझ पर खुला है अहद-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ का राज़
मैं इक हसीन फूल का रंग-ए-परीदा हूँ

तुझ को भी ज़िंदगी ने दिया दर्द-ए-बे-कराँ
मैं भी ग़म-ए-हयात का लज़्ज़त-चशीदा हूँ

तुझ से मिरा तअल्लुक़-ए-ख़ातिर है दाइमी
तू है अगर ग़ज़ल तो मैं तेरा क़सीदा हूँ

दुनिया मिटी हुई है मिरे इख़्तिसार पर
दोशीज़ा-ए-हयात की ज़ुल्फ़-ए-बुरीदा हूँ

तुम को मिरे तग़ाफ़ुल-ए-बे-जा का है गिला
मैं कुछ दिनों से ख़ुद से भी दामन-कशीदा हूँ

मैं सोचता हूँ मुझ पे ये तोहमत है किस लिए
अब वो भी कह रहे हैं कि मैं बरगुज़ीदा हूँ

काँटों से खेलता हूँ गुलिस्तान-ए-इश्क़ में
'परवेज़' फ़र्त-ए-शौक़ में दामन-दरीदा हूँ