उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHub thin mai-kade ki fazaen

ख़ूब थीं मय-कदे की फ़ज़ाएँ

خوب تھیں میکدے کی فضائیں

शायर: Parkash Nath Parvez8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ूब थीं मय-कदे की फ़ज़ाएँ
रह गईं छट के ग़म की घटाएँ

मौत इमदाद को आ चुकी है
उन से कह दो कि वो अब न आएँ

शो'ला-ए-हुस्न से क्या बचेगा
दामन-ए-दिल को हम क्या बचाएँ

हश्र ढाती है जुम्बिश नज़र की
फ़ित्ना-गर हैं किसी की अदाएँ

सोचते हैं कि उस बेवफ़ा को
याद रक्खें कि हम भूल जाएँ

हादसात-ए-जहाँ तौबा तौबा
उठ गईं हैं जहाँ से वफ़ाएँ

दिल में आबाद है एक दुनिया
आप महरूमियों पर न जाएँ

गोशा-ए-दिल से 'परवेज़' अब तक
आ रही हैं किसी की सदाएँ