उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gulshan se aae hain na bayaban se aae hain

गुलशन से आए हैं न बयाबाँ से आए हैं

گلشن سے آئے ہیں نہ بیاباں سے آئے ہیں

शायर: Parkash Nath Parvez9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुलशन से आए हैं न बयाबाँ से आए हैं
दीवाने तेरे सरहद-ए-इम्काँ से आए हैं

इक माह-वश के हुस्न-ए-फ़रोज़ाँ के फ़ैज़ से
दिल में तजल्लियात के तूफ़ाँ से आए हैं

आँखों में है बहार-ए-दो-आलम बसी हुई
हम लोग आज महफ़िल-ए-जानाँ से आए हैं

क्या तेरे बस में उन का मुदावा भी है कोई
दिल में जो ज़ख़्म लुत्फ़-ए-फ़रावाँ से आए हैं

अल्लह रे एहतिमाम-ए-बहाराँ के सिलसिले
सहरा में फूल सेहन-ए-गुलिस्ताँ से आए हैं

उन के करम की मुफ़्त में तौहीन हो गई
इल्ज़ाम हम पे तंगी-ए-दामाँ से आए हैं

दिल को ग़म-ए-जहाँ की शिकायत नहीं रही
आदाब-ए-ज़ीस्त सोहबत-ए-रिंदाँ से आए हैं

क्या याद आ गई वो निगाह-ए-जमील-तर
फिर दिल में इज़्तिराब के पैकाँ से आए हैं

'परवेज़' आसमाँ को न बदनाम कीजिए
जितने सितम हैं कू-ए-निगाराँ से आए हैं