उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sahar qarib hai taron ka haal kya hoga

सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा

سحر قریب ہے تاروں کا حال کیا ہوگا

शायर: श्रेय पुष्ट नहीं5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सहर क़रीब है तारों का हाल क्या होगा
अब इंतिज़ार के मारों का हाल क्या होगा

तिरी निगाह ने ज़ालिम कभी है ये सोचा
तिरी निगाह के मारों का हाल क्या होगा

मुक़ाबला है तिरे हुस्न का बहारों से
न जाने आज बहारों का हाल क्या होगा

नक़ाब उन का उलटना तो चाहता हूँ मगर
बिगड़ गए तो नज़ारों का हाल क्या होगा

मज़ाक़-ए-दीद ही 'सहबा' अगर बदल जाए
तो ज़िंदगी की बहारों का हाल क्या होगा