उर्दू शायरी · ग़ज़ल

safar zamin hi pe tha zer-e-asman mera

सफ़र ज़मीं ही पे था ज़ेर-ए-आसमाँ मेरा

سفر زمیں ہی پہ تھا زیر آسماں میرا

शायर: Badiuzzaman Khawar11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सफ़र ज़मीं ही पे था ज़ेर-ए-आसमाँ मेरा
मिला कहीं न हवा को मगर निशाँ मेरा

सबब है क्या मिरी तख़्लीक़ का बता मुझ को
न जब हयात है मेरी न ये जहाँ मेरा

मिटा के देख ये सदियों का फ़ासला इक दिन
बहुत क़रीब तिरे घर से है मकाँ मेरा

मैं आसमान में उड़ता हूँ शाम तक तो मुझे
मिरी ज़मीं पे बुलाता है आशियाँ मेरा

अभी तो सिर्फ़ कराहें हैं मेरे होंटों पर
सुना है गीत किसी ने अभी कहाँ मेरा

जो बात सच है वो कह दूँ तो फिर खुले शायद
कि मेरे यारों में है कौन हम-ज़बाँ मेरा

मुझे ज़मीं के अँधेरों में फेंक कर यारब
लिया है तू ने बहुत सख़्त इम्तिहाँ मेरा

सुना है शाम-ओ-सहर इंतिज़ार करते हैं
उफ़ुक़ के पार की बस्ती में रफ़्तगाँ मेरा

मैं अपनी ज़ात का अब क्यूँकर ए'तिबार करूँ
वजूद भी है 'अदम की तरफ़ रवाँ मेरा

किसी उजाले ने भेजा नहीं पयाम मुझे
सुना है जब से अंधेरा है मेज़बाँ मेरा

जो पढ़ चुके हैं मुझे उन से पूछ लो 'ख़ावर'
है दूसरों से जुदा किस क़दर बयाँ मेरा