उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sach yahi hai ki bahut aaj ghin aati hai mujhe

सच यही है कि बहुत आज घिन आती है मुझे

سچ یہی ہے کہ بہت آج گھن آتی ہے مجھے

शायर: Sabir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सच यही है कि बहुत आज घिन आती है मुझे
वैसे वो शय कभी मतलूब रही भी है मुझे

अपनी तन्हाई को बाज़ार घुमा लाया हूँ
घर की चौखट पे पहुँचते ही लिपटती है मुझे

तुझ से मिलता हूँ तो आ जाती है आँखों में नमी
तू समझता है शिकायत ये पुरानी है मुझे

उस के शर से मैं सदा माँगता रहता हूँ पनाह
इसी दुनिया से मोहब्बत भी बला की है मुझे

बस इसी वजह से है उस की ज़बाँ में लुक्नत
उस को वो बात सुनानी है जो कहनी है मुझे