उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamari bechaini uski palken bhigo gai hai

हमारी बेचैनी उस की पलकें भिगो गई है

ہماری بے چینی اس کی پلکیں بھگو گئی ہے

शायर: Sabir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमारी बेचैनी उस की पलकें भिगो गई है
ये रात यूँ बन रही है जैसे कि सो गई है

दिए थे काली घटा को हम ने उधार आँसू
किसे कहें अब कि सारी पूँजी डुबो गई है

हम उस की ख़ातिर बचा न पाएँगे उम्र अपनी
फ़ुज़ूल-ख़र्ची की हम को आदत सी हो गई है

वो एक साहिल कि जिस पे तुम ख़ुद को ढूँडते हो
वहीं पे इक शाम मेरे हिस्से की खो गई है

मैं यूँ ही मोहरे बढ़ा रहा हूँ झिजक झिजक कर
ख़बर उसे भी है बाज़ी वो हार तो गई है