उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sabhi gunah dhul gae saza hi aur ho gai

सभी गुनाह धुल गए सज़ा ही और हो गई

سبھی گناہ دھل گئے سزا ہی اور ہو گئی

शायर: Parveen Shakir8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सभी गुनाह धुल गए सज़ा ही और हो गई
मिरे वजूद पर तिरी गवाही और हो गई

रफ़ू-गरान-ए-शहर भी कमाल लोग थे मगर
सितारा-साज़ हाथ में क़बा ही और हो गई

बहुत से लोग शाम तक किवाड़ खोल कर रहे
फ़क़ीर-ए-शहर की मगर सदा ही और हो गई

अंधेरे में थे जब तलक ज़माना साज़-गार था
चराग़ क्या जला दिया हवा ही और हो गई

बहुत सँभल के चलने वाली थी पर अब के बार तो
वो गुल खिले कि शोख़ी-ए-सबा ही और हो गई

न जाने दुश्मनों की कौन बात याद आ गई
लबों तक आते आते बद-दुआ' ही और हो गई

ये मेरे हाथ की लकीरें खुल रही थीं या कि ख़ुद
शगुन की रात ख़ुशबू-ए-हिना ही और हो गई

ज़रा सी करगसों को आब-ओ-दाना की जो शह मिली
उक़ाब से ख़िताब की अदा ही और हो गई