उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sab ko hi us dar par tala dikhta tha

सब को ही उस दर पर ताला दिखता था

سب کو ہی اس در پر تالا دکھتا تھا

शायर: Yasir Khan Inam7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब को ही उस दर पर ताला दिखता था
मुझ को कोई दौड़ के आता दिखता था

करते थे वो दुआएँ अंधे होने की
प्यासों को ज़िंदाँ से दरिया दिखता था

वो था एक कनीज़ के कमरे का दर्पन
उस में देखने वाला रोता दिखता था

मैं ने उन आँखों में दुनिया देखी थी
और दुनिया को जाने क्या क्या दिखता था

उड़ता था जी भर के सवेरा होते ही
इक पंछी को ख़्वाब में पिंजरा दिखता था

लौटी थी वो एक वडेरे के घर से
उस को हर झूले में फंदा दिखता था

कुछ को दरिया बूँद के जैसा था 'यासिर'
कुछ को बस इक बूँद में दरिया दिखता था