उर्दू शायरी · ग़ज़ल

humne kab chaha ki wo shaKHs hamara ho jae

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए

ہم نے کب چاہا کہ وہ شخص ہمارا ہو جائے

शायर: Yasir Khan Inam4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए
इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए

हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है
तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए

तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से
है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए

है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ
हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए