उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sab ko apni tarah samajhti hai

सब को अपनी तरह समझती है

سب کو اپنی طرح سمجھتی ہے

शायर: Aamir Ata7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब को अपनी तरह समझती है
यार तू भी न कितनी भोली है

सुर्ख़ देखे हैं मैं ने लब उस के
ऐसा लगता है ख़ून पीती है

लड़ रही है वो बे-सबब मुझ से
शुक्र है 'इश्क़ अब भी बाक़ी है

उस को सुलझाने में लगे हैं सब
शा'इरी ज़ुल्फ़ या पहेली है

कल तलक मैं ही जिस का सब कुछ था
आज वो नाम से भी चिढ़ती है

जाते जाते वो कह रही थी मुझे
क्या करूँ ये ख़ुदा की मर्ज़ी है

मौत तो सर पे है खड़ी कब से
बैठिए आप कुर्सी ख़ाली है