उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sari KHush-fahmi shuur-o-falsafa pani hua

सारी ख़ुश-फ़हमी शु'ऊर-ओ-फ़ल्सफ़ा पानी हुआ

ساری خوش فہمی شعور و فلسفہ پانی ہوا

शायर: Zafar Moradabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सारी ख़ुश-फ़हमी शु'ऊर-ओ-फ़ल्सफ़ा पानी हुआ
वो उधर बोले इधर मेरा कहा पानी हुआ

भीगते लहजे में क्या करते कोई इज़हार-ए-हाल
लब से जो निकला वही हर्फ़-ए-दु'आ पानी हुआ

तुझ से मिल कर गुम हुए ख़ुद अपने ख़द्द-ओ-ख़ाल भी
मैं कि जैसे बर्फ़ था तू ने छुआ पानी हुआ

शे'र में मुमकिन नहीं ता'रीफ़ उस के हुस्न की
देख कर जिस का सरापा आईना पानी हुआ

सारे ला-यनहल मसाइल हाथ मलते रह गए
मैं सजा कर अपना पिंदार-ए-अना पानी हुआ

यूँ ही आँखों में नहीं आ जाते आँसू दोस्तो
दर्द का एहसास जब हद से बढ़ा पानी हुआ

अल-अमाँ ऐ ख़ुद-फ़रेबी अल-मदद ख़ुश-फ़हमियो
अब किसे आवाज़ दूँ सर से सिवा पानी हुआ

हम ने बिल-आख़िर वफ़ा की लाज रख ली दोस्तो
लेकिन इस जेहद-ए-'अमल में ख़ून का पानी हुआ

'उम्र भर की जुस्तुजू तिनकों की सूरत बह गई।
खो गईं सम्तें 'ज़फ़र' जब रास्ता पानी हुआ