उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sae mein aablon ki jalan aur baDh gai

साए में आबलों की जलन और बढ़ गई

سائے میں آبلوں کی جلن اور بڑھ گئی

शायर: Ejaz Rahmani8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साए में आबलों की जलन और बढ़ गई
थक कर जो बैठे हम तो थकन और बढ़ गई

कल इस क़दर था हब्स हमारे मकान में
सनकी हवा ज़रा तो घुटन और बढ़ गई

काँटों की गुफ़्तुगू से ख़लिश दिल में कम न थी
फूलों के तज़्किरे से चुभन और बढ़ गई

ये बाग़बाँ हमारे लहू का कमाल है
नैरंगी-ए-बहार-ए-चमन और बढ़ गई

ये हिज्र की है आग मिज़ाज उस का और है
अश्कों से शो'लगी-ए-बदन और बढ़ गई

सैराब कर सका न उसे मेरा ख़ून भी
कुछ तिश्नगी-ए-दार-ओ-रसन और बढ़ गई

हर्फ़-ए-सिपास पेश किया जब भी वो मिला
लेकिन जबीं पे उस की शिकन और बढ़ गई

तहरीर की जो एक ग़ज़ल उस के नाम पर
'एजाज़' आबरू-ए-सुख़न और बढ़ गई