उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rumuz-e-be-KHudi samjhe na asrar-e-KHudi samjhe

रुमूज़-ए-बे-ख़ुदी समझे न असरार-ए-ख़ुदी समझे

رموز بے خودی سمجھے نہ اسرار خودی سمجھے

शायर: Ehsan Danish Kandhlvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रुमूज़-ए-बे-ख़ुदी समझे न असरार-ए-ख़ुदी समझे
बड़ी शय है अगर अपनी हक़ीक़त आदमी समझे

ज़िया अंदर ज़िया तनवीर दर तनवीर ज़ौ दर ज़ौ
कोई आख़िर कहाँ तक राज़-हा-ए-ज़िंदगी

नहीं हटती नज़र अंजाम-ए-आलम से नहीं हटती
उसे कोई ख़ुदी गर्दान ले या बे-ख़ुदी समझे

बहुत मुश्किल है इस मेआ'र की रिंदी ज़माने में
जो लग़्ज़िश को गुनह और बे-ख़ुदी को ज़िंदगी समझे

जब एहसास-ए-बुलंदी पस्त कर देता है फ़ितरत को
ये मुश्किल है फिर इंसाँ आदमी को आदमी समझे

जुनूँ इक मंज़िल-ए-बे-नाम को तय करता जाता है
किसे फ़ुर्सत है जो सूद-ओ-ज़ियान-ए-ज़िंदगी समझे

हमें तो मुद्दतों से जुस्तुजू है ऐसे इंसाँ की
हमारी ज़िंदगी को भी जो अपनी ज़िंदगी समझे

जला पाती है इस से रूह दिल बेदार होता है
बड़ी मुद्दत में हम 'एहसान' क़द्र-ए-मुफ़्लिसी समझे