उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rukne ka samay guzar gaya hai

रुकने का समय गुज़र गया है

رکنے کا سمے گزر گیا ہے

शायर: Parveen Shakir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रुकने का समय गुज़र गया है
जाना तिरा अब ठहर गया है

रुख़्सत की घड़ी खड़ी है सर पर
दिल कोई दो-नीम कर गया है

मातम की फ़ज़ा है शहर-ए-दिल में
मुझ में कोई शख़्स मर गया है

बुझने को है फिर से चश्म-ए-नर्गिस
फिर ख़्वाब-ए-सबा बिखर गया है

बस एक निगाह की थी उस ने
सारा चेहरा निखर गया है