उर्दू शायरी · ग़ज़ल

roz kaTte hain yahan hath kamane wale

रोज़ कटते हैं यहाँ हाथ कमाने वाले

روز کٹتے ہیں یہاں ہاتھ کمانے والے

शायर: Umair Ali Anjum7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रोज़ कटते हैं यहाँ हाथ कमाने वाले
जीने देते नहीं मुफ़्लिस को ज़माने वाले

अपना नफ़रत की सियासत से त'अल्लुक़ ही नहीं
हम हैं दम तोड़ती क़द्रों को बचाने वाले

बाँटते हैं जो ज़मीनों को कोई और हैं वो
हम नहीं सहन में दीवार उठाने वाले

आख़िर इक दिन उन्हें तज़लील तो सहना होगी
जो हैं कम-ज़र्फ़ का एहसान उठाने वाले

वा'दा-ए-'इश्क़ निभाने नहीं आते उस को
वही अंदाज़ हैं उस के भी ज़माने वाले

देखना कल इसी धरती से नुमू पाएँगे
मुफ़लिसों के लिए आवाज़ उठाने वाले

यार यारों के लिए जान लुटाते थे 'उमैर'
अब कहाँ लोग त'अल्लुक़ को निभाने वाले