उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gardish-e-waqt ka manzar nahin dekha jata

गर्दिश-ए-वक़्त का मंज़र नहीं देखा जाता

گردش وقت کا منظر نہیں دیکھا جاتا

शायर: Umair Ali Anjum6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गर्दिश-ए-वक़्त का मंज़र नहीं देखा जाता
यार के हाथ में ख़ंजर नहीं देखा जाता

कोई रुख़्सत करे और आँख में आँसू भी न हों
ऐसे लम्हात में मुड़ कर नहीं देखा जाता

ये रिवायत मिरे पुरखों से चली आई है
'इश्क़ में यार को छू कर नहीं देखा जाता

ऐ ख़ुदा शहर के हाकिम को हिदायत दे दे
चार-सू 'अर्सा-ए-महशर नहीं देखा जाता

हम कि दम तोड़ती क़द्रों के अमीं हैं हम से
बिंत-ए-हव्वा का खुला सर नहीं देखा जाता

हाए उस हुस्न-ए-बला-ख़ेज़ की तासीर 'उमैर'
देर तक उस को बराबर नहीं देखा जाता