उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rida-e-abr nahin KHema-e-ghubar nahin

रिदा-ए-अब्र नहीं ख़ेमा-ए-ग़ुबार नहीं

ردائے ابر نہیں خیمۂ غبار نہیں

शायर: Lutf-ur-rahman6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रिदा-ए-अब्र नहीं ख़ेमा-ए-ग़ुबार नहीं
मिरा सफ़र किसी पहलू से साज़गार नहीं

तनी हुई है धनक की तरह लहू की कमाँ
लगा वो तीर जो मंज़र के आर-पार नहीं

हमारी राह से लश्कर ग़मों के गुज़रे हैं
हमारे जिस्म पे ज़ख़्मों का कुछ शुमार नहीं

खिली हुई है ज़मिस्ताँ की धूप आँगन में
चले भी आओ कि मौसम का ए'तिबार नहीं

कुछ और देर जलाए रखो लहू के चराग़
ख़लीज-ए-शब है ये सहरा-ए-बे-कनार नहीं

हमारी ख़ाक को रख कर हवा के रस्ते में
दिया है ग़म भी इक ऐसा जो पाएदार नहीं