उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajib dasht hai naqsh-e-pas-e-safar bhi nahin

'अजीब दश्त है नक़्श-ए-पस-ए-सफ़र भी नहीं

عجیب دشت ہے نقش پس سفر بھی نہیں

शायर: Lutf-ur-rahman5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अजीब दश्त है नक़्श-ए-पस-ए-सफ़र भी नहीं
यहाँ से आगे कहीं कोई रह-गुज़र भी नहीं

बजाओ तब्ल कि परचम लहू का लहराऊँ
ख़ुद अपनी ज़द पे हूँ और सूरत-ए-मफ़र भी नहीं

यही कि करता रहूँ ख़ुद को मैं मुसलसल रद्द
मिरे बचाव की अब सूरत-ए-दिगर भी नहीं

मैं इस हुजूम से कट कर चला तो आऊँ मगर
क़रीब-ओ-दूर कोई राह मुख़्तसर भी नहीं

दयार-ए-संग को दे दो पता मिरे घर का
तमाम शहर में अब कोई शीशागर भी नहीं