उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raushni ho na saki sham ke hangam ke sath

रौशनी हो न सकी शाम के हंगाम के साथ

روشنی ہو نہ سکی شام کے ہنگام کے ساتھ

शायर: Baldev singh Hamdam7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रौशनी हो न सकी शाम के हंगाम के साथ
और हम दीप जलाते रहे हर शाम के साथ

दूर बढ़ता ही गया हसरत-ए-नाकाम के साथ
दिल में इक टीस उठी आप के हंगाम के साथ

आप ने पुर्सिश-ए-ग़म का भी तकल्लुफ़ न किया
दिल में हम जलते रहे हसरत-ए-नाकाम के साथ

जाने क्यूँ आज मिरे इश्क़ की तश्हीर हुई
हर ज़बाँ पर है मिरा नाम तेरे नाम के साथ

दौर-ए-मय ख़त्म हुआ शम्अ का दिल बैठ गया
रौनक़-ए-बज़्म गई साक़ी-ए-गुलफ़ाम के साथ

वक़्त की बात है क्या वक़्त गुज़र जाएगा
और कुछ देर चलो गर्दिश-ए-अय्याम के साथ

मंज़िल-ए-इश्क़ में क्या काम था उन का 'हमदम'
थक के जो बैठ गए राह में आराम के साथ