उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raegan jata hai kab ulfat mein diwanon ka KHun

राएगाँ जाता है कब उल्फ़त में दीवानों का ख़ूँ

رائیگاں جاتا ہے کب الفت میں دیوانوں کا خوں

शायर: Baldev singh Hamdam5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

राएगाँ जाता है कब उल्फ़त में दीवानों का ख़ूँ
रंग लाता है किसी दिन इन के अरमानों का ख़ूँ

हुस्न-ए-गुल पर इस क़दर माइल न हो ऐ अंदलीब
हो के रह जाएगा इक दिन तेरे अरमानों का ख़ूँ

ख़ाक बुलबुल ने सँवारा ग़ाज़ा भी कर हुस्न-ए-गुल
और नूर-ए-शम्अ' में चमका है परवानों का ख़ूँ

आशियाने में क़फ़स का ज़िक्र था सूहान-ए-रूह
अब क़फ़स में हो रहा है दिल के अरमानों का ख़ूँ

सुब्ह तक ऐ शम्अ' तुझ को जगमगाना है फ़क़त
किस लिए नाहक़ किए जाते हैं परवानों का ख़ूँ