उर्दू शायरी · ग़ज़ल

junun baghair kabhi aagahi nahin hoti

जुनूँ बग़ैर कभी आगही नहीं होती

جنوں بغیر کبھی آگہی نہیں ہوتی

शायर: Baldev singh Hamdam8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जुनूँ बग़ैर कभी आगही नहीं होती
जले न शम्अ तो कुछ रौशनी नहीं होती

वो सज्दा सज्दा नहीं जिस में होश बाक़ी हो
ब-क़ैद-ए-होश जो हो बंदगी नहीं होती

क़बा-ए-हुस्न की ताबिश अगर हो आँखों में
बशर के दिल में कभी तीरगी नहीं होती

क़दम क़दम पे जो खाए फ़रेब हस्ती का
उस आदमी की कोई ज़िंदगी नहीं होती

रुमूज़-ए-ज़ीस्त से वाक़िफ़ हुआ है जो इंसाँ
बका-ए-ज़ीस्त की उस को ख़ुशी नहीं होती

बशर के वास्ते लाज़िम है जज़्बा-ए-उल्फ़त
चमन में गुल न हो तो ज़िंदगी नहीं होती

बशर का अज़्म निखरता है मुश्किलों ही में
अलम न जिस में हो वो ज़िंदगी नहीं होती

इसी उमीद पे 'हमदम' गुनाह करता हूँ
ख़ुदा के घर में करम की कमी नहीं होती