उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raushni hi raushni hai shahr mein

रौशनी ही रौशनी है शहर में

روشنی ہی روشنی ہے شہر میں

शायर: Badiuzzaman Khawar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रौशनी ही रौशनी है शहर में
फिर भी गोया तीरगी है शहर में

रोज़-ओ-शब के शोर-ओ-ग़ुल के बावजूद
इक तरह की ख़ामुशी है शहर में

रेल की पटरी पे सो जाते हैं लोग
कितनी आसाँ ख़ुद-कुशी है शहर में

जो इमारत है वो सर से पाँव तक
इश्तिहारों से सजी है शहर में

गाँव छोड़े हो चुकी मुद्दत मगर
'ख़ावर' अब तक अजनबी है शहर में