उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rakhiye zaban-e-Khaar hamari zaban ke sath

रखिए ज़बान-ए-ख़ार हमारी ज़बाँ के साथ

رکھئے زبان خار ہماری زباں کے ساتھ

शायर: Om Krishn Rahat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रखिए ज़बान-ए-ख़ार हमारी ज़बाँ के साथ
इस का बयाँ मिलेगा हमारे बयाँ के साथ

क्या जानें क्यों हमारी यक़ीं से न निभ सकी
हम आज तक निबाह रहे हैं गुमाँ के साथ

एक एक भेद खोल के छोड़ेंगे उस का हम
अब ज़िद सी हो गई है हमें आसमाँ के साथ

लगता है जैसे बात कोई बेश-ओ-कम की है
फिर आज शैख़ उलझे हैं पीर-ए-मुग़ाँ के साथ

सीखेंगे किस से पार उतरने का आप फ़न
हम ने तो बाँध रक्खे हैं पत्थर ज़बाँ के साथ

वो तो सुलूक करता रहा है बुरा-भला
हम भी बिगाड़ बैठे हैं यारो जहाँ के साथ

बे-लुत्फ़ ऐसी हो गई 'राहत' ये ज़िंदगी
जैसे बिगड़ गई हो किसी मेहरबाँ के साथ