उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rahoge humse kab tak be-KHabar se

रहोगे हम से कब तक बे-ख़बर से

رہو گے ہم سے کب تک بے خبر سے

शायर: Hafeez Shahid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रहोगे हम से कब तक बे-ख़बर से
जुदा होती नहीं दीवार दर से

मुसाफ़िर हाल क्या अपना सुनाए
अभी लौटा नहीं अपने सफ़र से

हमेशा तो नहीं रहता है क़ाएम
तअ'ल्लुक़ राह-रौ का रहगुज़र से

मकानों से मकीं रुख़्सत हुए हैं
उदासी झाँकती है बाम-ओ-दर से

अभी तक हूँ सफ़र में इर्तिक़ा के
मुझे लगते थे रस्ते मुख़्तसर से

इसी मिट्टी से है पहचान मेरी
मोहब्बत है मुझे भी अपने घर से

न जाने उन पे क्या गुज़री थी 'शाहिद'
जुदा पत्ते हुए थे जब शजर से