उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rahi hai yun hi nadamat mujhe muqaddar se

रही है यूँ ही नदामत मुझे मुक़द्दर से

رہی ہے یوں ہی ندامت مجھے مقدر سے

शायर: Vijay Sharma5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रही है यूँ ही नदामत मुझे मुक़द्दर से
गुज़र रही है सबा जिस तरह मिरे घर से

चढ़ा है शौक़ मुझे ज़ब्त आज़माने का
लिखूँ फ़साना कोई आइने पे पत्थर से

मुसाफ़िरों सा कभी जब मैं शहर से गुज़रा
तो रास्तों में कई रास्ते थे बंजर से

तुम्हारे ग़म ने डुबोया है पर पुकारो तो
मैं लौट आऊँ उसी पल किसी समुंदर से

मज़े की ठण्ड ग़रीबों की आस्तीन में है
तुम आ के देख लो फ़ुटपाथ पर भी बिस्तर से