उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rahe hamesha muKHatib bas apni zat se hum

रहे हमेशा मुख़ातिब बस अपनी ज़ात से हम

رہے ہمیشہ مخاطب بس اپنی ذات سے ہم

शायर: Qadir Siddiqi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रहे हमेशा मुख़ातिब बस अपनी ज़ात से हम
रुजूअ' होते भी क्या हुस्न-ए-काएनात से हम

अब आ गई है वो साअ'त कि दिन की बात करें
डरा करेंगे कहाँ तक अँधेरी रात से हम

क़दम क़दम पे तो हम ने है ज़ेहन को घेरा
क़दम क़दम पे बचे गो तवहहुमात से हम

ख़ुदा के वास्ते अब दाम-ए-आगही न बिछा
डरा किए हैं ख़िरद तेरी बात बात से हम

न छूट पाए हैं अब तक न छूट पाएँगे
दिल-ओ-निगाह के रंगीं मुआमलात से हम

खुलें तो कैसे खुलें राज़-हा-ए-अक़्ल-ओ-जुनूँ
निगाह फेरे हुए हैं मुशाहिदात से हम

हमें यक़ीं में भी अब शक दिखाई देता है
घिरे हुए हैं कुछ ऐसे ही वाक़िआ'त से हम

ज़माना लाख करे कोशिशें बचाने की
निकल सकेंगे न अफ़्सून-ए-इल्तिफ़ात से हम

हमें डराएँ न अहबाब अब हवादिस से
बने हुए हैं हक़ीक़त में हादसात से हम

ज़माना उर्दू अदब को भुला न पाएगा
बना रहे हैं वो तस्वीर अपने हाथ से हम

ज़बाँ तक आ नहीं पाई सदा-ए-दिल 'क़ादिर'
बंधे हुए हैं कुछ ऐसे तकल्लुफ़ात से हम