उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rafiq-o-monis-o-hamdam koi mila hi nahin

रफ़ीक़-ओ-मोनिस-ओ-हमदम कोई मिला ही नहीं

رفیق و مونس و ہمدم کوئی ملا ہی نہیں

शायर: Qadir Siddiqi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रफ़ीक़-ओ-मोनिस-ओ-हमदम कोई मिला ही नहीं
वो क्या जिए जिसे जीने का आसरा ही नहीं

उसे हक़ीक़त-ए-उज़मा समझ के इतराए
वो नक़्श-ए-ज़ीस्त जो सच पूछिए बना ही नहीं

ख़ुदा के वास्ते कुछ रौशनी घटा दीजे
नज़र है ख़ीरा कुछ ऐसी कि सूझता ही नहीं

हवास-ओ-होश-ओ-ख़िरद सब वहाँ सलामत हैं
जहाँ निगाह का जादू कभी चला ही नहीं

वो अपनी ज़ात से बाहर निकल के क्या जाए
वो दीदा-वर जो किसी सम्त देखता ही नहीं

तिरी निगाह के सदक़े तिरी नज़र के निसार
गिरा जो तेरी नज़र से वो फिर उठा ही नहीं

उस एक बात के क़ुर्बान जाइए कि जिसे
तमाम उम्र कहा और कुछ कहा ही नहीं

फ़साना-ए-दिल-ए-सद-चाक का मआल न पूछ
सुना तो उस ने मगर जैसे कुछ सुना ही नहीं

दिखाऊँ भी तो किसे दर्द-ओ-रंज की तस्वीर
मिरे जहाँ में कोई दर्द-आश्ना ही नहीं

मिरे रफ़ीक़ मुझे दरस-ए-मस्लहत क्यों दें
दिलों की बात है याँ मस्लहत रवा ही नहीं

ज़माना उस से ख़ुशी क्यों तलब करे 'क़ादिर'
जिसे ग़मों के सिवा और कुछ मिला ही नहीं