उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raste lakh sahi koi bhi rahbar na lage

रास्ते लाख सही कोई भी रहबर न लगे

راستے لاکھ سہی کوئی بھی رہبر نہ لگے

शायर: Sabahat Urooj5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रास्ते लाख सही कोई भी रहबर न लगे
ये भी मुमकिन है कि दर वा हो मगर दर न लगे

अजनबी लोग हैं उस पार की बस्ती में मगर
मुझ को इस पार भी अपना तो कोई घर न लगे

ऐसे बिछड़ा कि ज़माने से वो लौटा ही नहीं
है दुआ ऐसे परिंदे को कभी पर न लगे

अब कि ढूँडूँगी ठिकाना मैं कोई दश्त के पास
यूँ सर-ए-आम तमाशे का जहाँ डर न लगे

अक्स है अक्स अरे उस का तक़ाज़ा भी समझ
आँख शीशे का मुक़द्दर है तो पत्थर न लगे