उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jism se rahguzar banate hain

जिस्म से रहगुज़र बनाते हैं

جسم سے رہ گزر بناتے ہیں

शायर: Sabahat Urooj9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस्म से रहगुज़र बनाते हैं
आ मोहब्बत को शर बनाते हैं

सिर्फ़ दीवार-ओ-दर बनाते हैं
और दावा है घर बनाते हैं

ख़ुद को बार-ए-दिगर बनाते हैं
और अब सोच कर बनाते हैं

आज लकड़ी के जोड़ कर तख़्ते
डूब जाने का डर बनाते हैं

जिन के पाँव वो काट लेते हैं
उन के जिस्मों पे सर बनाते हैं

ये लुटेरे ही मेरे मोहसिन हैं
बंद गलियों में दर बनाते हैं

उस ने उड़ना है और सम्तों में
आइए बाल-ओ-पर बनाते हैं

हम ने जाना नहीं कहीं भी तू
क्यों ये राह-ए-सफ़र बनाते हैं

अब 'सबाहत' ख़ुदा बने हैं वो
अब वो शम्स-ओ-क़मर बनाते हैं