उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rah mein jab bhi kabhi koi nadi aai hai

राह में जब भी कभी कोई नदी आई है

راہ میں جب بھی کبھی کوئی ندی آئی ہے

शायर: Tahseen Moradabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

राह में जब भी कभी कोई नदी आई है
ख़ैर-मक़्दम को मिरे नाव चली आई है

सौ बलाओं ने किया मेरा त'आक़ुब बढ़ कर
मेरे हिस्से में यहाँ जब भी ख़ुशी आई है

इम्तिहाँ देने का उल्फ़त में सवाल आते ही
काम हर हाल में मेरी ही ख़ुदी आई है

बे-नक़ाब उस को यहाँ देख के कुछ ऐसा लगा
ख़्वाब में जैसे मिरे सब्ज़ परी आई है

पहले तो इतनी न थी देश में नफ़रत रक़्साँ
अब तो अपनों की भी उल्फ़त में कमी आई है

कम क़यामत से नहीं लगती है 'तहसीन' मुझे
कैसे अंदाज़ा हो ये कैसी सदी आई है