उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qarnon purana waqt ko lalkarta hua

क़रनों पुराना वक़्त को ललकारता हुआ

قرنوں پرانا وقت کو للکارتا ہوا

शायर: Balraj Hairat12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़रनों पुराना वक़्त को ललकारता हुआ
इक शहर है हमारे भी अंदर बसा हुआ

सुलझा रहा था अर्ज़-ओ-समा की वो गुत्थियाँ सभी
सब के लिए ख़ुद एक मो'अम्मा बना हुआ

शायद निज़ाम-ए-शम्सी के सीने का ख़्वाब था
मैं देखता रहा जिसे आँखें बना हुआ

अब उस को आफ़्ताब में ढलने का हुक्म दो
इक अश्क-ए-ग़म है नोक-ए-मिज़ा पर खड़ा हुआ

ख़ुद में न जज़्ब कर लूँ कहीं तेरी ज़ात को
सर-ता-क़दम मैं ज़ौक़-ए-तलब में रचा हुआ

फिर छा रहा है ज़ह्न पर इक साया दोस्तो
सब कुछ समेटता हुआ ख़ुद फैलता हुआ

तन्हा तुम्हीं तो मरकज़-ए-असरार-ए-दिल न थे
मैं भी वहीं कहीं था तुम्हें देखता हुआ

रूहें न जाने कौन सी दुनिया में खो गईं
इक जिस्म चीख़ता है सड़क पर पड़ा हुआ

कब तक रहूँ हज़ार जहाँ-दर-जहाँ लिए
मैं दरमियाँ अज़ल और अबद के खड़ा हुआ

उम्मीद कोई हर्फ़-ओ-हिकायत से थी किसे
लेकिन निगाह-ए-नाज़ तुझे भी ये क्या हुआ

आँखों में आ के जान खड़ी देखती रही
हाथों से दामन-ए-ग़म-ए-दिल छूटता हुआ

'हैरत' कहाँ थे दस्त-ब-दिल देखते हुए''
बारिश में भीगता हुआ शो'ला बना हुआ